21 October 2008

मुझसे मिरा हक छीनो, ये हक मैंने नही दिया तुमको.

1)
नटखट बचपन मेरा है, उसको नटखट ही रहने दो।
पागल आवारा दिल को मस्ती अल्हड में बहने दो।
मैं बूढा हूँ तो क्या जो सच है मुझको वो कहने दो।
कुछ और ही सोचा है मैंने, मुझे भरोसा है उस पर।
मैंने बुनी अपनी दुनिया, मुझे भरोसा है उस पर।
तुम कौन हो मुझको बतलाते, ग़लत सही की परिभाषा,
मुझसे मिरा हक छीनो, ये हक मैंने नही दिया तुमको।
२)
मैं जनता हूँ बेचारी जो चुनती सरकारें सत्ता।
मैं भाषा हूँ तुम लोगो की, बोले मुझको हर बच्चा।
मैं सच हूँ ये सब जाने पर कौन यहाँ सच की सुनता।
कुछ मैंने तुमसे कहा नही, जब तुमने करी अपने मन की।
सब कुछ तो मैंने सहा सभी, जब तुमने करी अपने मन की।
तुम कौन हो मुझको बतलाते, ग़लत सही की परिभाषा,
मुझसे मिरा हक छीनो, ये हक मैंने नही दिया तुमको।

6 comments:

वर्षा said...

टिप्पणी करने का तो हक़ होगा। अच्छा लिखा।

फ़िरदौस ख़ान said...

अच्छा लिखा है आपने...

Vivek Gupta said...

उत्तम विचार

योगेन्द्र मौदगिल said...

काव्यमयी सही बात के लिये
साधुवाद स्वीकारें
अंकित जी

गौतम राजऋषि said...

बढिया प्र्स्तुति है दोस्त.

Ankit said...

आप सभी का धन्यवाद्,

- अंकित सफ़र